Government Museum, Sikar

सीकर शहर के मध्य माधोसागर तालाब के पास स्थित राजकीय संग्रहालय, सीकर में शेखावाटी क्षेत्र की पुराधरोहर को संजोकर शेखावाटी के गौरवशाली वैभव को प्रदर्शित किया गया हैं । सीकर संग्रहालय की स्थापना का उदेश्य शेखावाटी क्षेत्र की कला - पुरा सामग्री को संकलित कर संरक्षित करना है ताकि इस महान विरासत को आने वाली पीढि़यों के लिए सुरक्षित किया जा सकें । सीकर  संग्रहालय की स्थापना सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित भवन में पुरातत्व संग्रहालय विभाग राज0 जयपुर द्वारा की गई हैं इस संग्रहालय का विधिवत उद्धघाटन  सन 2006 में किया गया ।
      संग्रहालय को 8 दीर्घाओं में विभाजित किया गया है जिसमें शिलालेख  उत्खन्न से प्राप्त सामग्री, पाषाण प्रतिमाएॅं,  लघुचित्र, हथियार, सिक्के और कलात्मक पुरावस्तुओं को प्रदर्शित किया गया हैं ।

1- शिलालेख:- राजकीय संग्रहालय, सीकर में शेखावाटी से संबंधित शिलालेखों का अच्छा संकलन हैं, जिनमें हर्ष सम्वत् 201 का खण्डला से प्राप्त शिलालेख, विक्रम सम्वत् 1030 का हर्ष से प्राप्त शिलालेख, विक्रम सम्वत् 1221 का सीकर संग्रहालय से प्राप्त शिलालेख, विक्रम सम्वत् 1243 का रैवासा से प्राप्त चंदेलो के शिलालेख शामिल हैं ।

2- उत्खन्न सामग्री:- राजकीय संग्रहालय, सीकर में संकलित पुरा सामग्री में गणेश्वर पुरास्थल से प्राप्त  विभिन्न प्रकार के मृदभांड, जिनमें अलंकृत व सादे दोनो प्रकार के हैं, शामिल हैं । ये मृदभांड संकरे व चैड़े मुंह वाले, लोटे, छोटे प्याले, छोटी हांडियां तथा विभिन्न आकार-प्रकार के हैं । संभवतः संकरे मुंह वाले बेलनाकर बर्तनों का प्रयोग बहुमूल्य द्रव्य तथा छोटे प्यालों का प्रयोग चषक के रूप में किया जाता था । इसके अलावा उत्खनित सामग्री में  ताम्र के बाणाग्र, मछली पकड़ने के कांटे, चूडि़यां, मनके, चकरी कुल्हाड़ी आदि प्रदर्शित हैं, ये सामग्री दो से ढाई हजार ई0पू0 की हैं इसके अलावा झुंझूनू के पुरास्थल सुनारी से प्राप्त प्रस्तर व मृण्मय मनके, खेलने के मोहरे, अस्थि उपकरण, खिलौना गाडी के पहिए, बौद्ध मांगलिक चिन्ह युक्त फलक, चूडिया, लौह कुल्हाडि़यां आदि प्रदर्शित किये गए हैं । उत्खन्न की पद्धति पर आधारित एक माॅडल ओर प्राचीन जनजीवन के दृष्यों को प्रदर्शित करते कुछ चित्र भी चित्रित किये गये हैं, जिससे दर्शकों का मार्गदर्शन हो सकें ।

3- पाषाण प्रतिमाएॅः-  राजकीय संग्रहालय, सीकर में संकलित पाषाण प्रतिमाओं में हर्ष पर्वत से प्राप्त प्रतिमाएॅें जिनमें शेषशाही विष्णु, वैकुण्ड विष्णु, हरिहरपितामाहमार्तण्ड, आसनस्थ शिव, ऊध्र्वरतस् शिव, नृत्यरत शिव, लक्ष्मी, ब्रह्यजी, गणेश, दस्तहस्ता महेश्वरी, भैरवी, अंबिका, इन्द्राणी, चामुण्डा, ब्रह्यणी, लिलिया, कुमारी, अष्वथामा वध करते हुए भीम, सूर्य पुत्र रेंवत, स्थानक विष्णु, नवगृह फलक तथा अष्टदिगपाल इन्द्र, अग्नि, यम, नृऋत, वरूण, वायु, कुबेर और ईशाशामिल हैं । इसके अलावा सुरसुन्दरी, शैवाचार्य और योगिनियां तथा विभिन्न प्रकार के जनजीवन और संगीत नृत्य से संबंधित फलक आदि शामिल हैं ।
       खरसाडू से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी, हरिहर, गणेश, स्थानक विष्णु और अष्विनीकुमारों के साथ सूर्य व रघुनाथगढ़ से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी और सुरसुन्दरी आदि संग्रहालय में संकलित हैं ।  मण्डा सुरैरा से प्राप्त गजेन्द्रमोक्ष, आसनस्थ शिव, यमदण्डधरादेवी और जटाधारीदेवाकृति, बालेश्वर से प्राप्त शेषषाही विष्णु और स्थानक विष्णु, सुद्रासन से प्राप्त नृत्यरत शिव, तपस्यालीन पार्वती और अष्टदिग्पाल, खण्डेला से प्राप्त सूर्य पुत्र रेंवत और विष्णु मंदिर का कलश आदि महत्वपूर्ण हैं ।
       संग्रहालय की महत्वपूर्ण पाषाण प्रतिमाओं में हरिहरपितामाहमार्तण्ड़ अद्धभुत प्रतिमा हैं जिसमें सूर्य के साथ-साथ ब्रह्या, विष्णु और शिव को प्रदर्शित करते हुए, सभी चारों देवो के आयुधो के साथ-साथ वाहनों का भी अंकन हैं । दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिमा नवगृह फलक हैं जिसमें शुक्र, शनि, राहु और केतु के अंकन के साथ एक नारी प्रतिमा का प्रदर्शन  हैं जो लम्बे उतरीय तथा बिजोराफल को थामे हुए हैं । प्रतिमा विज्ञान में ये अंकन अनोखा और दुर्लभ हैं । तीसरी प्रतिमा सूर्य पुत्र रेंवत की हैं जिसमें अष्व सवार रेंवत के साथ सूर्य के परिचारको - दांडी और पिंगल को भी अष्व पर सवार दिखाया गया हैं यह स्वतंत्र प्रतिमा है जो किसी देवकुलिका में पूजान्तर्गत रही होगी । चौथी प्रतिमा गजेन्द्रपोक्षफलक हैं जिसमें भगवान विष्णु को ग्राह से गजेन्द्र का उद्धार करते हुए प्रदर्शित किया गया हैं, इसमें मानवरूप में गरूड़ का अंकन हैं । पांचवी प्रतिमा भैवरी की हैं, जटामुकुटधारी देवी के हाथों में पुस्तक, पुष्पकलिका और पानपात्र का प्रदर्शन हैं । छठी प्रतिमा द्विबाहु नटे शिव की हैं, जो अपने गणों के साथ नृत्य का प्रदर्शन कर रही हैं । सातवी प्रतिमा पाशुपत पूजाफलक हैं जिसमें मनुष्यों को मांसभक्षण तथा सुरापान करते हुए दिखाया गया हैं
     संग्रहालय में संकलित पाषाण प्रतिमाओं के अलावा गौराउ गांव नागौर से प्राप्त धातु प्रतिमाएॅं उल्लेखनीय हैं, जिनमें ऋषबदेव, पार्शवनाथ और पदमप्रभु की प्रतिमा शामिल हैं ये प्रतिमाएॅं 11वीं शताब्दी से संबंधित हैं ।

4- लघु चित्रकलाः- राजकीय संग्रहालय, सीकर में जयपुर शैली की राग-रागिनी चित्रकला के अलावा राधाकिन, राम का अभिषेक, राम-रावण युद्ध, महिषासुरमर्दिनी और कुछ रेखाचित्र भी शामिल हैं ।
       राग-रागिनी लघुचित्रों में छः रागो, भैरव, मालकोस, हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ तथा इन रागों की पाँच-पाँच रागनियों का चित्रण किया गया हैं । चित्रों की पृष्भूमि में छः ऋतुओं के अनुसार मौसम का चित्रण किया गया हैं क्योकि शास्त्रीय मान्यताओं में रागो को गाने का समय और ऋतु निस्चित हैं।

 5- अस्त्र -स्त्र:- राजकीय संग्रहालय, सीकर में दर्शकों के ज्ञान और मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए भरतपुर से प्राप्त हथियारों को प्रदर्शित किया गया हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें यथा किरिच, तेगा, खण्डा, सेखला, नीमचा, उना, सुदेट और कत्ता आदि है । तोङेदार, पत्थरकला टोपीदार और कारतूसी आदि विभिन्न प्रकार की बंदूको के अलावा पेकब्ज छुरियां, भाले तथा सैनिको के कवच और ढाल प्रदर्शित किये गये हैं ।

6- सिक्केः- राजकीय संग्रहालय, सीकर में शेखावाटी के विभिन्न स्थानों से प्राप्त सिक्कों का प्रदर्शन किया गया हैं । यहां कुराधन (नीम का थाना) डाडा, फतेहपुरा (खेतडी, झुझुनूं) से प्राप्त कुषाणकालीन सिक्के, धमव (चूरू) से प्राप्त इण्डो-ससैनियन सिक्के, गलेर(राजगढ़ चूरू) तथा गनेडी (सीकर) से प्राप्त आदिवराह सिक्के, लाडूसर (सीकर), गनेडी और गलेर से प्राप्त अष्वारोही  एवं वृषभ प्रकार  के सिक्के, हर्ष से प्राप्त सल्तनत कालीन सिक्के, झुझुनू, कटराथल (सीकर), विलंगा की रोही (सुजानगढ, चुरू) तथा खागीपावडा (सुजानगढ़ चूरू ) से प्राप्त जौनपुर सुल्तान के सिक्के, भदेसर (सरदारशहर, चुरू) से प्राप्त मुगलकालीन सिक्के तथा सराय (उदयपुरवाटी, झुंझुनू) से प्राप्त रियासतकालीन सिक्कों का प्रदर्शन किया गया हैं ।
      खण्डेला तहसील के गुरारा गांव से मिली चांदी की आहत मुद्राओं के अग्रभाग पर सूर्य षड्चक्र, गैंडा, मछली, वृषभ, पत्ती, कंसला, हाथी, मेंडक आदि तथा पृष्ठभाग पर अनेक छोटो-छोटे चिन्ह बने हुए हैं ।
       गनेडी से 9वीं शताब्दी ई0 के आदिवराह प्रकार के सिक्के मिले हैं । चांदी के इन सिक्कों का भार लगभग 3.56 ग्राम हैं । सिक्के के अग्रभाग पर धरणी उद्धारक विष्णु के वराह अवतार का अंकन हैं। स्थानक वराह को बायीं ओर रेखते दर्षाया गया हैं । शूकर मुखधारी मानव आकृति जिसका पिछला दाहिना पांव तथा बायां पैर घुटने के जोड से र्मोडकर भूमि से उठा हुआ हैं । बायां पैर युगल सर्प के शीर्ष पर रखा हैं । वाराह के दायें हाथ में युगल सर्प की पूंछ हैं । बायां हाथ घुटने के ऊपर बताया गया हैं । वाराह ने घुटनों तक वनमाला पहन रखी है तथा ऊपर की तरफ कमल दल या पुष्पों का अंकन हैं । वाराह की बायीं  कोहनी पर पृथ्वी का अंकन हैं । उसे गदा, पद्म शंख एवं चक्र के साथ दर्शाया गया हैं । सिक्के के पृष्ठभाग के बीच में एक स्तम्भ हैं । इस स्तम्भ के ऊपर लपटें प्रज्जवलित होती अग्निवेदिका बनी हुई हैं । इस अग्निवेदिका के दोनों ओर एक-एक महिला आकृति के प्रतिक चिन्हों का अंकन हैं तथा उपर की तरफ नागरी लिपि में श्रीमददिवराह लिखा हुआ है ।
       लाडूसर से 11-12 शताब्दी की अष्वारोही व वृषभ प्रकार की ताम्र मुद्राएॅ मिली हैं । इन मुद्राओं के अग्रभाग पर अष्वारोही के एक हाथ में भाला या पताका हैं और दूसरे हाथ में अष्व की लगाम पकड रखी हैं । इस तरफ नागरी लिपि में श्री हमीर लिखा हुआ हैं । इसके पृष्ठभाग पर कूबडधारी वृषभ का अंकन है ! वृषभ के मुख  पर आंखे बिन्दू के रूप् में अंकित है तथा सींग उपर की तरफ मुडे हुए है । वृषभ की पीठ पर कपड़ा है तथा कूल्हे पर त्रिशूल का अंकन हैं । श्री महमूद साम लिखा हुआ है । ऐसी मुद्राएॅ गनेड़ी से भी मिली हैं मगर ये चांदी की हैं । उन पर  हर्ष सेपर अल सुल्तान-उल-आजम/अलाउदीन वल-दीन अंकित हैं ।
      झुंझूनू, कटराथल और दिलंगा की रोही (चूरू) से हिजरी सन् 885 में जौनपुर सुल्लतान इब्राहीम शाह द्वारा प्रचलित तांबे के सिक्के मिले हैं । इन सिक्को के अग्रभाग पर अलरू-सिकन्दर अल-जमन-अल-मुत्वक्किल अलाह सुल्तान इब्राहीम शाह तथा पृष्ठभाग पर अल-खलीफाह-अल-मुस्तकंफी अमीर-अल-मुमीनीन खलादत् खिलाफतुहु (सम्पूर्ण ईष्वर हैं । मुसलमानों का सर्वोच्च सरदार । उसका राज्य सदैव रहें ।) अंकित हैं ।
      भदेसर (चूरू) से मुगलकालीन चांदी की मुद्राएॅ मिली है । मुहम्मद शाह रंगीला द्वारा जारी की गई इन मुद्राओं के अग्रभाग पर मुहम्मद शाह बादशाह गाजी/साहिब किरान सानी/सिक्का मुबारक तथा पृष्ठभाग पर  षहजहानबाद दर अलखल जरबसरनह् 11 जुलूस मैमनत मानूस लिखा गया हैं । सराय (झुंझूनू) से 11.37 ग्राम भार का चांदी का सिक्का मिला हैं । यह सिक्का 1809 ई0 में जयपुर के हाराजा सवाई जगतसिंह के समय मे मुगल बादशाह अकबर द्वितीय के नाम से जयपुर टकसाल में टंकित किया गया था । इसके मुखपृठ पर बादशाह मुहम्मद अकबर शाह गाजी साहब किरान सानी सिक्का मुबारक तथा पृष्ठभाग पर मानूस मैमनत सनह् 25 जुलूस जरब सवाई जयपुर लिखा हुआ हैं। यहां से जयपुर के शासक सवाई प्रतापसिंह का सिक्का भी मिला हैं ।

7-  लोकजीवनः- राजकीय संग्रहालय, सीकर में प्लास्टर आॅफ पेरिस की प्रतिमाओं के माध्यम से शेखावाटी के लोक जीवन को प्रदर्शित किया गया हैं पहली दीर्घा में रसोड़े का दृशय  हैं, जिसमें महिला बाजरे की रोटियां बना रही हैं और रसोई में काम आने वाली वस्तुओं के साथ-साथ पुरूष को भोजन करते हुए एवं बच्चे को खिलोनो के साथ खेलते हुए प्रदर्शित किया गया हैं । दूसरी दीर्घा में शेखावाटी के प्रसिद्ध नृत्य गींदड़ का प्रदर्शन हैं ।

8- 8वी वीथिका:- इस वीथिका में समय समय पर शेखावाटी से संबंधित कला-पुरा सामग्री को छायाचित्रो के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है क्योकि शेखावाटी में भितिचित्रों के साथ-साथ बहुत से ऐसे स्मारक हैं जिनका दिग्दर्शन दर्शकों के हर वर्ग के लिये ज्ञानवर्धक होगा ।